इन मुए ब्लॉगों और मोबाइलों के माध्यम से लोगों ने सारी मर्यादाएं ही तोड़कर रख दी हैं। अब तक तो सिरफिरे और दीवाने आशिक खूबसूरत अभिनेत्रियों करीना कपूर, मल्लिका शेरावत, मनीषा कोइराला, कंगना रानौत आदि को निशाना बनाते आ रहे थे, लेकिन यह क्या गजब हो गया कि हिंदी फिल्मों के बुजुर्ग अभिनेता शहंशाह अमिताभ बच्चन को भी किसी सिरफिरे ने अपने संदेश रूपी तीरों का निशाना बना दिया!

हद तो यह है कि उस सिरफिरे ने पहले तो बिग बी के मोबाइल पर अश्लील संदेश भेजे और फिर उसने आज के लोकप्रिय सोशल नेटवर्किंग ब्लॉग का सहारा भी लिया यानी अश्लील संदेशों का हमला चारों तरफ से। यानी आधुनिक और नए मीडिया का इस्तेमाल गाली-गलौज करने में और वह भी देश के एक इज्जतदार और प्रतिष्ठित अभिनेता के खिलाफ!

अमिताभ भी इस हरकत से काफी आहत हैं। भई, वे तो युवाओं को भी मात देते हुए इस नए आधुनिक मीडिया का इस्तेमाल कर रहे थे, अपने साथ होनेवाली हर छोटी-बड़ी घटना, अपने दिल की बात, अपने विचार, अपनी टिप्पणी, अपनी ख्वाहिश और भी बहुत कुछ वे बड़े ही करीने से और नियमित रूप से अपने चाहनेवालों के साथ बांट रहे थे।

लेकिन यह तो एक नया ही बखेड़ा खड़ा हो गया और उस बखेड़े से यह ज्ञान भी हुआ कि भई, अपने दिल की बात कहने के बाद हमें दूसरों के दिलों की बात या फिर कह लें ‘भड़ास’ सुनने के लिए भी तैयार रहना होगा।


चिली के वे 33 खनन मजदूर पिछले तीन सप्ताहों से दुनिया से कटकर एक अंधेरी खान में जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं! मौत से जद्दोजहद कर रहे हैं! प्रार्थनाएं कर रहे हैं कि उन्हें फिर से उनकी अपनी दुनिया मिल जाए, उनके अपनों से वे मिल जाएं।

राहतकर्मियों व इंजीनियरों को अनुमान है कि 2,300 फुट की गहराई में फंसे इन मजदूरों को सूरज की रौशनी नसीब होने के लिए कम से कम तीन से चार महीने लग जाएंगे।

उस अंधेरी खान में आशा की किरण तब फूटी जब एक प्लास्टिक नली के सहारे उन लोगों को खाना-पानी भेजने का रास्ता मिल गया।

अब उन्हें खाद्य पदार्थ ऐसे मिल रहे हैं, मानो प्रकृति किसी मां की कोख में विकसित होते भ्रूण को गर्भनाल की मदद से पोषण पहुंचा रही हो।

वैज्ञानिक और राहतकर्मी उन्हें जल्द से जल्द बचाने के लिए तरह-तरह की जुगत लगा रहे हैं। कोशिशें ये भी की जा रही हैं कि उन्हें खाद्य पदार्थों के साथ वैक्सीन, दवाएं, गर्मी से बचने के विशेष कपड़े, बिस्तर, स्पीकर, टीवी, म्यूजिक प्लेयर जैसे साधन भेजे जाएं, ताकि जब तक उन्हें बाहर नहीं निकाल लिया जाता, तब तक वे खुद को किसी न किसी तरह तन व मन से स्वस्थ रखते रहें।

कहते हैं न कि ‘जाको राखे साइयां, मार सके न कोय’। बस ऐसा ही कुछ इन 33 मजदूरों के साथ भी हो रहा है। वे सभी अदम्य मानवीय जीजिविषा की मिसाल कायम करते हुए उस अंधेरी गुफा में जी रहे हैं, सांसें ले रहे हैं और सबसे बढ़कर खुद पर और उस सर्वशक्तिमान पर आस्था रखे हुए हैं कि बचेंगे और जरूर बचेंगे।

आस्था की शक्ति उस समय और मजबूत हुई, जब सिर्फ बीस सेकंड के लिए खान में फंसे एक मजदूर ने अपने बूढ़े पिता से बात करते हुए उनसे कहा, “सब्र और आस्था रखें!”


 

प्रकाश झा की फिल्म “राजनीति” का प्रथम भाग अत्युत्तम है। महाभारत को समकालीन राजनीति से जोड़ना इतना सटीक बन पड़ा है कि आश्चर्य होता है, क्या महाभारतकाल से अब तक भारतीय राजनीति में कुछ नहीं बदला?

उत्तरार्ध में कहानी महाभारत से हट जाती है और राजनीतिक जोड़तोड़ की कहानी बन जाती है। फिल्म देखते समय हमें लगा, अगर हम लिखते तो “राजनीति” का उत्तरार्ध इंदिरा गांधी की कहानी से जोड़ देते।

प्रकाश झा की “राजनीति” का अंत वहीं होता है जहां एक सीधी-सादी और दिल की साफ इंदु (कैटरीना कैफ) पारिवारिक बलिदान के नाम पर राजनीति का मोहरा बना कर आगे कर दी जाती है और दूसरों की जीत का पायदान बनती है।

इंदिरा गांधी की राजनीतिक कहानी इसी बिंदु से शुरू हुई थी, जब चुप्पी, शर्मीली और पिता तथा पति को खो चुकी इंदु को प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के असामयिक निधन के बाद कांग्रेस से प्रधानमंत्री पद पर बैठा दिया था।

तब के कांग्रेसी दिग्गज भी यही मान कर चल रहे थे कि इस गूंगी गुड़िया को कठपुतली बना कर वे सत्ता के खेल की डोरियां अपने हाथ में रख लेंगे। विपक्ष के समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने उस इंदु को व्यंग्य से “गूंगी गुड़िया” कह कर पुकारा था।

लेकिन वह इंदु न तो गूंगी निकली, न गुड़िया।

राजनीतिक चालें चलने में उसने किस तरह कांग्रेस और विपक्ष के दिग्गजों को समय- समय पर मात दी, यह लंबा किस्सा है।
शायद प्रकाश झा उस पर “राजनीति:2” बना लें।


एक ही विषयवस्तु ( कभी- कभी भोलेपन में हुआ अपराध भी जिंदगी बना देता है) पर बनीं दो फिल्में। एक महा- उबाऊ पर समीक्षकों की कृपा से हुई हिट, दूसरी फिल्म बेहतरीन, पर समीक्षकों की उपेक्षा से हुई गायब।

“कमीने” उस श्रेणी की फिल्म है जिसे हम “ऑस्कर फिल्म” कहते हैं। कलात्मक, प्रयोगधर्मी, सिरदर्दिया, अंधेरे में फिल्माई गई, इतनी धीमी कि घड़ी की जगह कैलेण्डर देखने को दिल चाहे। अर्थात- फिल्म समीक्षकों की अति प्रिय, पांच में चार सितारा पाने वाली फिल्म।

दूसरी फिल्म “संकट सिटी”, जो प्रयोगधर्मी नाम के बावजूद हास्य से भरपूर, महा- तेज रफ्तार और के के मेनन और दिलीप प्रभावलकर के अनुपम अभिनय से जीवंत। घटनाक्रम इतनी तेजी से घूमता रहता है कि आपका सिर घूम जाए और जब तक आप संवाद पर दिल खोल कर हंसे, दृश्य बदल जाए। और सस्पेंस इस तरह आपको लपेट ले कि यह भूल कर कि आप सिनेमाघर में हैं आप मुख्य पात्रों पर पल-पल आ रही आपदा पर ऎसे सीट से उछलें जैसे आप भी पर्दे पर जी रहे हों।
क्या आपने देखी थीं ये दो फिल्में? क्या राय है आपकी इस बारे में?


जब सुनील गावस्कर ने कोलकाता नाइट राइडर्स की टीम में चार कप्तान बनाए जाने के सिद्धांत की आलोचना की थी तब शाहरुख खान ने कहा था, मिस्टर गावस्कर ने 20-20 क्रिकेट नहीं खेला है इसलिए अपनी सलाह अपने पास रखें।
 सुनील गावस्कर पर भड़के शाहरूख!

आज शाहरुख की टीम कोलकाता नाइट राइडर्स की दुर्दशा देख कर गावस्कर हंस- हंस कर लोट पोट हो रहे होंगे। धोखा दे कर कप्तानी से हटाए गए सौरव गांगुली के कलेजे को ठंडक मिल रही होगी।
बुकानन ने दिया गावस्कर को जवाब

तब तो शाहरुख को कोई नहीं समझा सकता था, अब शायद उन्हें अकल आ गई होगा कि क्रिकेट पैसे का नहीं, प्रतिभा का खेल है और पैसे की गठरी तो दुनिया में करोड़ों लोगों के पास है, लेकिन क्रिकेट का वरदान सिर्फ गावस्कर और गांगुली जैसे चंद खास लोगों को मिला है।